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नोएडा-ग्रेटर नोएडा में रुके हुए प्रॉजेक्ट्स के लिए नई एग्जिट पॉलिसी को मंजूरी

October 22, 2016 | By

गौतम बुद्ध नगर में तीनों विकास प्राधिकरणों ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा में प्रॉजेक्ट्स पूरा कर पाने में नाकाम साबित हो रहे बिल्डरों के लिए चिर प्रतिक्षित एग्जिट पॉलिसी को मंजूरी दे दी है। माना जा रहा है कि यह कदम से घर खरीदने वाले ग्राहकों के हितों की सुरक्षा के मद्देनजर उठाया गया है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा के विकास प्राधिकरण इन प्रॉजेक्ट्स से जुड़े एस्क्रो अकाउंट्स पर निगरानी रखेंगे और इन खातों में जमा पैसे का इस्तेमाल शेड्यूल से पीछे चल रहे हाउसिंग प्रॉजेक्ट्स को पूरा करने में किया जाएगा।

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नई प्रॉजेक्ट सेटलमेंट पॉलिसी को राज्य सरकार की मंजूरी के लिए भेज दिया गया है। राज्य सरकार से हरी झंडी मिलने के साथ ही नई नीति प्रभावी हो जाएगी। नोएडा विकास प्राधिकरण के चेयरमैन रमा रमण ने बताया कि सरकार की मंजूरी मिलने के बाद बिल्डरों के लिए एस्क्रो अकाउंट खोलना बाध्यकारी हो जाएगा। बिल्डरों के लिए एग्जिट पॉलिसी मुख्यतः चार परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।

पहली परिस्थिति
अगर बिल्डर को जमीन आवंटित कर दी गई है और प्रॉजेक्ट का काम अभी शुरू नहीं हो पाया है और न बिल्डर के पास अभी तक फ्लैट बेचने का अधिकार है। रमा रमन बताते हैं कि इस सूरत में अथॉरिटी के पास बिल्डर के डिपॉजिट का 30 फीसदी जब्त कर लिया जाएगा।

ग्रेटर नोएडा इंडस्ट्रियल डिवेलपमेंट अथॉरिटी के CEO दीपक अग्रवाल कहते हैं कि अगर तीसरे पक्ष के अधिकार सृजित हो गए हों (इसका मतलब बिल्डर ने ग्राहकों से प्रॉपर्टी की बुकिंग ले ली हो) तो बाकी 70 फीसदी रकम ग्राहकों को वापस कर दी जाएगी।उन्होंने आगे बताया, ‘खरीदार को लौटाई जाने वाली रकम बिना ब्याज के होगी लेकिन अगर बिल्डर और कस्टमर के बीच ब्याज को लेकर कोई समझौता हो तो इसकी जिम्मेदारी बिल्डर पर जाएगी।’

दूसरी परिस्थिति
अगर बिल्डर ने प्रॉजेक्ट पूरा कर लिया है और कम्प्लेशन सर्टिफिकेट हासिल नहीं कर पा रहा हो तो डिवेलपर जमीन की कीमत को लेकर भुगतान का नया शेड्यूल पेश करेगा। इस समय सीमा के बारे में उत्तर प्रदेश सरकार महीने भर के भीतर फैसला कर लेगी। दीपक अग्रवाल बताते हैं, ‘उन मामलों में जहां खरीदार अपनी प्रॉपर्टी रजिस्टर नहीं करा पा रहे हों बिल्डरों को 25 फीसदी के बजाय 10 फीसदी रकम जमा करानी होगी। और इसके बाद कस्टमर अपनी प्रॉपर्टी रजिस्टर्ड और लीज का पट्टा तैयार करा सकेंगे।’

तीसरी परिस्थिति
अगर बिल्डर ने आवंटित जमीन के एक हिस्से पर प्रॉजेक्ट शुरू कर दिया है लेकिन बाकी हिस्सा बिना इस्तेमाल के पड़ा हुआ है तो डिवेलपर के डिपॉजिट की 15 फीसदी रकम जब्त करने के बाद अथॉरिटी बाकी रकम के अनुपात में बिल्डर को जमीन आवंटित करेगा। इसका मतलब यह हुआ कि बिल्डर जमीन के केवल उसी हिस्से को अपने पास रख सकेगा जिसपर उसने काम शुरू कर दिया हो और बाकी जमीन अथॉरिटी वापस ले लेगी।

चौथी परिस्थिति
अगर बिल्डर प्रॉजेक्ट पूरा करने के लिए किसी पार्टनर की तलाश में हो। अग्रवाल कहते हैं, ‘रुके हुए प्रॉजेक्ट को पूरा करने के लिए बिल्डर किसी पार्टनर को अपने साथ जोड़ सकता है। वह प्रॉजेक्ट के उस हिस्से को नए पार्टनर को बेच सकेगा जिसका काम अभी रुका हुआ हो और जिसे नया पार्टनर पूरा करेगा। बिक्री से मिली रकम एस्क्रो अकाउंट में जमा होगी और इस पैसे का इस्तेमाल घर के खरीदारों के लिए किया जाएगा।’

दीपक अग्रवाल का कहना है कि नई नीति बिल्डरों को राहत देने के मकसद से नहीं बल्कि घर बुकिंग कराने वाले लोगों की समस्याओं को सुलझाने के इरादे से तैयार की गई है।

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